Thursday, January 23, 2014

मेरी पहली पिकनिक


मेरी पहली पिकनिक

कई बार जब बचपन को याद करता हूं, तो यादों का दायरा इतना बड़ा हो जाता है कि जिंदगी छोटी लगने लगती है। आज जब अपने बच्चों को हम अपने सामर्थ्य से ज्य़ादा देने का प्रयास करते हैं, तो उसकी तुलना में अपना बचपन कुछ दरिद्र सा लगने लगता है। कई बार लगता है कि जो जीवन, जो बेबाक जीवन जो बेफ्रिक्री का जीवन हमने जिया, क्या आज हम अपने बच्चों को वैसे जीने देने की हिम्मत कर सकते हैं
वर्ष 1976 की बात है। करीब दस साल की उमऱ रही होगी। आज की तरह उस समय भी ट्यूशन का चलन था। और ट्यूशन आज की तरह व्यापार नहीं था। कलकत्ता (आज के बच्चे इसे कोलकाता के नाम से जानते हैं।) में मैं रहता था और तब पांचवीं कक्षा में था। हमारे स्कूल के मास्टर जी थे एस. के. सिंह। सिंह सर वैसे तो अंग्रेजी के अध्यापक थे परंतु तब के चलन के अनुसार या कहें कि आज के चलन के अनुसार कोई भी अध्यापक जब ट्यूशन पढ़ाने निकलता है तो सभी विषयों का अध्यापक हो जाता है। हमारे सिंह सर स्वभाव के बेहद अच्छे थे। सभी बच्चों को ट्यूशन ही नहीं, क्लास में भी समान रूप से ध्यान रखते थे।
मास्टर जी का घर हमारे घर से करीब तीन किलोमीटर दूर था। पर जब बचपन का जोश हो और पैर कहने को तो पैर हो पर उनमें चरखी लगीं हों, तो काहे का तीन और काहे का तीस किलोमीटर। स्कूल से घर लौटना होता था करीब ढाई बजे तक। फिर खाना पीना, भाई-बहनों से प्यार-लड़ाई और चार बजते ही ट्यूशन के लिए रवाना। दो घंटे की पढ़ाई के बाद सात से आठ के बीच घर लौटना होता था। अब याद नहीं कि रोज जाते थे या एकाध दिन छोड़कर ट्यूशन की कक्षा लगती था।
बीत करीब दशहरे के समय की है। पढ़ाई का जोर कुछ कम था। पता नहीं हमारे सर जी को क्या सूझी, उन्होंने बच्चों को एक पिकनिक पर ले जाने की ठानी। पिता जी मैनेजर थे और उन्हें फुरसत नहीं होती थी कि बच्चों को कहीं पिकनिक पर ले जा सकें। उन्होंने जाने की स्वीकित दे दी।
मेरा घर कालीघाट में था, यू समझिए मां काली की गोद में ही हमारा घर था। चार कदम पर शक्तिपीठ काली मंदिर था। मंदिर से पचास कदम की दूरी पर गंगा से निकली एक धारा जिसे नहर भी कह सकते हैं काली घाट से गुजरती थी। कलकत्ता की गंगा तो हुगली है और जब ज्वार भाटा आता, तो हमारे घर के पास का बाजार करीब तीन फुट पानी में डूब जाता। कुछ घंटों के बाद जैसे पानी आता वैसे ही चला भी जाता, अपने साथ बाजार की सभी गंदगी को समेटकर।
हां तो पिकनिक का प्रोग्राम बना बोटानिकल गार्डन का। यह मेरे घर से नहीं भी तो करीब तीस किलोमीटर की दूरी पर होगा। इसके लिए तब हावड़ा स्टेशन जाना पड़ता था और वहीं से दूसरी बस लेकर गार्डन जाना होता था। सभी बच्चों को समझा दिया गया कि अपनी मां से खाना बनवाकर लाना है। कोई रोटी तो कोई सब्जी बनवाकर लाने वाला था। किसी के पापा ने खाने के बदले मिठाईयां ही भेज दी थीं। कुल नौ बच्चे थे, जिनमें दो लड़कियां भी थी। अब नाम किसी का याद नहीं।
तो एक सुबह मास्टर जी के घर सभी बच्चे इकट्ठे हुए और हमारा जत्था पिकनिक पर चल पड़ा। कमाल की बात यह कि चूंकि जाना मास्टर जी के साथ था इसलिए घर से जो कुछ पैसा मिला, वह मास्टर जी के पास रखवा दिया गया क्योंकि खर्च तो उन्होंने ही करना था। कोई दोपहर के लगभग हमारी टीम बोटानिकल गार्डन पहुंच गई। थोड़ी देर घूमा गया और फिर एक जगह, जहां काफी खुला स्थान था, चादरें बिछ गई और टोली लग गई जीमने।
जीमने का कार्य संपन्न हुआ। थोड़ा आराम किया गया। मास्टर जी ने बच्चों को गार्डन के बारे में बताया, फिर कुछ नाच-गाना हुआ और फिर टोली चल पड़ी आगे की सैर पर।
तब आज की तरह द ग्रेट बनयान ट्री यानी महान बरगद का पेड़ ग्रिल के साए में सांस नहीं लेता था। उस समय तो उस बूढ़े बाबा की जटाएं सब के लिए खुली हुई थीं। बच्चे उस पर लटकते थे। उसे छूकर उसके अतीत को जानने का प्रयास करते थे। तो हम बच्चे भी मस्ती करने लगे। चारों तरफ लोगों का हुजूम किसी मेले से कम नहीं था। इसी हुजूम में हम भी मिल गए थे कि अचानक किसी की आश्चर्यमिश्रित चीख सुनाई दी-वो देखो, सांप।
सांप का नाम सुनते ही कईयों का सांप सूंघ गया, तो कई मिल्का सिंह की तरह फर्राटा लगाकर वहां से पार हो गए। हम सबने जब सच में कही गई दिशा में नजरें घुमाईं तो सचमुच एक सांप नजर आया। हम बच्चों के लिए तो यह एक अद्भुत क्षण था। मैं तो बड़े ही ध्यान से उसे देखता रहा। कुछ देर उसके पीछे पीछे चला, फिर उस पर तब तक नजरें गड़ी रहीं जब तक वह नजरों से ओझल न हो गया।
सांप गया तो मुफ्त का तमाशा भी खत्म हो गया। मैं भी मायूस होकर मास्टर जी और अपने दल की ओर पलटा, तो सन्न।
सांप की तरह ही मास्टर जी और हमारा दल गायब हो चुका था। अब शाम के धुंधलके में मैं अपने घर से करीब तीस किलोमीटर दूर, एक अनजान एक अपिरचित स्थान पर अकेला खड़ा था।
मेरी पिकनिक-पार्ट-2
जब न कोई साथी दिखा और न ही पितातुल्य सर जी, तो अब तो होश उड़ना तय था। होश उड़े भी गए। पहले सांप गायब, फिर टीम गायब, अब होश गायब। एक दस साल के बच्चे के लिए एक साथ इतना कुछ गायब होना काफी था। सो हिम्मत टूटते ही कंठ से रुलाई फूट निकली। पर इस रोने में न तो सुर था, न ताल और न ही चीख, बस फफककर रोना शुरु हो गया। बचपने में सुनी कई कहानियां याद आ गईं, जब बच्चा गायब हुआ तो चाय की दुकान पर मिला या फिर ट्रेन में बूट पालिश करता पाया गया। अब  मैं अपनी मां से कभी नहीं मिलूंगा, इस सोच ने हृदय को और चीर दिया। नतीजा, रूदन तेज से तेज होता गया और एक बच्चे को इस तरह अकेले रोते देख लोगों की भीड़ जुटनी शुरू हुई। मुझे याद है, पहला सवाल एक बुजुर्ग ने किया था--क्या हुआ बेटा.
बेटे ने रोते स्वर में बता दिया कि क्या, कैसे हुआ था।
-कहां रहते हो। अगला सवाल हुआ।
चूकि मां काली के चरणों में निवास स्थान था, इसलिए फट से बता दिया कि कालीघाट में रहता हूं।
-ओह यह तो बहुत दूर है. क्या कोई उस ओर  जाने वाला है.-बूढ़े बाबा ने हाक सी लगाई।
पर कोई उधर का नहीं था। इसलिए सन्नाटे को चीरने भी कोई नहीं आया।
अचानक एक युवक आगे आया। उसने कहा-मैं हावड़ा तक जा रहा हूं। मैं वहां से इस बच्चे को कालीघाट के लिए ट्राम में बैठा सकता हूं।
इतना सहारा भी कम न था उस बच्चे के लिए जिसे यह भी पता न था कि इस गार्डन से निकलकर हावड़ा कैसे पहुंचा जा सकता है। कालीघाट तो बहुत दूर की कौड़ी थी।
अब बुजर्ग ने पूछा-बेटा-इनके साथ जाओगे। यह तुम्हें ट्राम में बैठा देंगे।
मुझे क्या परेशानी थी, मैंने हामी भर दी। पर अगले क्षण ही याद आया जेब में तो माया का नामोमिशान न था, वह सब तो मास्टर जी को दे चुका था। याद आते ही फिर रोना शुरु। बुजुर्ग के पूछने पर जब यह समस्या बताई, तो वह हंस पड़े। उन्होंने मदद की अपील की तो देखते-देखते आठ-दस रुपए उस युवक को दे दिए गए ताकि वह मुझे ट्राम में बैठा सके।
अब उस युवक के साथ मैं चल पड़ा। नजरें अब भी रास्ते पर मास्टर जी को ढूंढ़ रही थी पर उनका कोई पता न चला।
उस भले युवक ने मुझे हावड़ा पहुंचाया। वहीं से कालीघाट के लिए सीधी ट्राम सर्विस थी। उसने मुझे ट्राम में बैठाया। कंडक्टर को बता दिया कि बच्चे को कालीघाट उतार देना। फिर टिकट लेकर मेरे पास आया और बोला-बेटा ध्यान से बैठना सोना मत। कोई कुछ भी कहे, कालीघाट से पहले मत उतरना। और यह लो टिकट और बाकी पैसे।
टिकट तो ठीक थी, पर पैसे .....
मैंने पैसे लेने से मना कर दिया। पर उसने कहा-बेटा, ये पैसे  उन्होंने दिए थे। तुम रख लो। रास्ते में कोई और जरूरत पड़ी तो काम आएंगे तुम्हारे। कहकर उसने सिर पर हाथ फेरा और उतरकर गुम हो गया।
शाम के सात बज चुके थे। कलकत्ते के हिसाब से यह काफी समय होना था। चूकि चिंता कम हो गई थी और घर पहुंचने का रास्ता मिल गया था, अब मन कुछ शांत था और पेट में अब चूहे भी कूदने लगे थे। पर मैं सीट पर जमकर बैठा रहा। ट्राम खुली, हावड़ा ब्रिज होते हुए धमर्तल्ला, पार्क स्ट्रीट, मैदान, खिदिरपुर होते हुए जब ट्राम कालीघाट पहुंची, तो साढे आठ के आसपास वक्त हुआ था। पिता जी इसी टाइम पर घर आते थे, इसलिए लगा नहीं कि मैं बहुत लेट हूं। कालीघाट  स्टेशन के पास पुचका वालों की भीड़ खड़ी होती थी। वही पुचका वाले जिन्हें दिल्ली में गोलगप्पे या पानी पूड़ी भी कहा जाता है। अब घर के पास पहुंच चुका था। रास्ता जाना पहचाना था। हालत कुछ वैसी ही थी जैसे अपने इलाके में पहुंचकर.....भी खुद को शेर समझने लगता है। तिस पर जेब में अब तो कुछ पैसे भी थे। पेट में आंतों ने जब खुद को उलझाया तो भूख से मैं बिलबिला उठा। कदम खुद ब खुद पुचका वाले की ओर बढ़ गए और थोड़ी देर में ही पेट को आराम मिल गया।
अब प्रफुल्ल मन से कदम घर की ओर बढ़ चले। और जब मैं घर पहुंचा तो डर लगा कि मास्टर जी आकर सब बता चुके होंगे और डांट पड़ेगी।


मैं और पिता जी (1975)


पर मास्टर जी घर तक नहीं पहुंचे थे और वहां माहौल शांत था। मेरी हिम्मत नहीं हुई कि  मैं अपने इस एडवेंचरस पिकनिक पार्टी की कहानी घरवालों को सुनाऊं। इसलिए चुपचाप थका होने के कारण मां के हाथ की खाना खाया और सो गया। अब इत्मिनान था कि न तो चाय के वर्तन धोने है और न बूट पालिश करनी है।
अगले रोज सुबह उठा। करीब छह, सवा छह का समय होगा। इतवार का दिन था इसलिए स्कूल जाने का भी चक्कर नहीं था। मैं ब्रश करते हुआ गली में आ गया। तभी मेरी नजर पड़ी दूर से आते एक व्यक्ति पर पड़ी, जो हांफता-कांपता सा प्रतीत हो रहा था। वह जब पास आया, तो मेरी जान सी सूख गई। वह हमारे सिंह मास्टर जी थे, जिनकी सिट्टी-पिट्टी गुम थी कि वह मेरे घर वालों को क्या जवाब देंगे कि उनका लाड़ला कहां गया.
पर उन्हें देखकर मेरी जान सूखी, तो मुझे देखकर उनकी जान में जान आई। और जब वह घर के अंदर आए और घरवालों को शाम की घटना बताई तो सबकी नजरें मुझ पर टिकी थीं। पिता जी मुझे डांटना भूल गए और न ही वह मास्टर जी को कुछ कह पाए कि अगर मैं  रात तो घर में न पहुंचता तो क्या होता और वह रात को खबर करने क्यों नहीं आए। मैं तो बस एक कोने में मां के पल्लू  के सहारे खड़ा था। इतना मुझे मालूम था कि जब तक इस पल्लू का सहारा है, मुझ पर कोई विपदा आ नहीं सकती।
तो ऐसी रही मेरी पहली पिकनिक। एडवेंचरस, दिल को डराने वाली और यह भी हिम्मत देने वाली कि बच्चा हो या बड़ा हिम्मत से और दिमाग से काम ले, तो रास्ता सूझ ही जाता है।

अनिल जायसवाल

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